क्यों नहीं बन पाती विपक्षी एकता ? – N K Singh

Nawal Kishor Singh, विपक्षी

विपक्ष और उसकी एकता मात्र एक छलावा बन कर रह गयी है और इस एकता का मुजाहरा गाहे-ब-गाहे संसद में हंगामा करने तक हीं महदूद रह गया है- N K Singh

New Delhi, Jul 17 : किसी भी शासन –पद्धति में, जो “एड्वर्सेरियल डेमोक्रेसी” (द्वंदात्मक प्रजातंत्र) की अवधारणा पर आधारित हो –जैसा कि भारत में है– विपक्ष की अहम् भूमिका होती है. अगर जन-धरातल में विपक्ष का यह स्थान कम होता जाये तो उससे प्रजातंत्र की गुणवत्ता पर असर पड़ता है. चूंकि सत्ता की प्रकृति हीं इस पर काबिज़ लोगों को भ्रष्ट करने की और अधिनायकवादी बनाने की होती है इसलिए विपक्ष और मजबूत मीडिया अच्छे शासन को सुनिश्चित करने के लिए अपरिहार्य कारक हैं. इनके विलुप्त होने का एक अन्य ख़तरा होता है कि शासक समूह के भीतर से हीं कई बार विरोध के स्वर उठने लगते हैं लिहाज़ा शासन करने वाले को भी विपक्ष और मीडिया को अपने हित में अपने खिलाफ मुखर होने की चाह रखनी चाहिए.

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आज देश की ६२ प्रतिशत आबादी पर भारतीय जनता पार्टी का अपनी राज्य सरकारों के जरिये शासन है और यह बढ़ता जा रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी –कांग्रेस—आज सिमट कर मात्र आठ प्रतिशत जनसँख्या पर शासन में है. राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव में क्या परिणाम होंगे यह सबको मालूम है. विपक्ष और उसकी एकता मात्र एक छलावा बन कर रह गयी है और इस एकता का मुजाहरा गाहे-ब-गाहे संसद में हंगामा करने तक हीं महदूद रह गया है.
भारत में पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष कमजोर हीं नहीं हुआ बल्कि लकवाग्रस्त सा लग रहा है. दुनिया के अन्य प्रजातान्त्रिक देशों जैसे अमेरिका और ब्रिटेन से अलग भारत के सन्दर्भ में इसका मतलब बिलकुल अलग होता है. इन दोनों देशों में मूल रूप से द्वि-दलीय व्यवस्था है (हाल में ब्रिटेन में भले हीं एक तीसरा दल भी राजनीतिक धरातल पर काबिज हुआ है). भारत में समाज के सैकड़ों पहचान –समूह में बंटे होने के कारण यह संभव नहीं है. लेकिन मुश्किल यह है कि ये पहचान समूह किसी कल्याण के तार्किक भाव के कारण नहीं पैदा हुए बल्कि जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता और भावनात्मक अतिरेक की उपज हैं. भारत में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (जिसको ज्यादा वोट वहीं जीता ) चुनाव –पध्यति के कारण राजनीतिक वर्ग को यह आसन लगता है कि समाज को इसी तरह के पहचान समूहों में बाँट कर वोट हासिल करे. इसके कारण मुख्य दल –कांग्रेस – सिकुड़ने लगा क्योंकि उसके पास जातिवाद की कोई काट नहीं थी. धर्म-निरपेक्षता कांग्रेस के लिए महज मुसलमानों के वोट की ख़ातिर एक नारा था। इस वोट बैंक मे भी इन जातिवादी पार्टियों ने सेंध लगाई. होना तो यह चाहिए था कि पार्टियाँ अपनी विचारधारा बनायें और उनसे जनता को प्रभावित करें पर इसकी जहमत कौन लें. लिहाज़ा जब भारतीय जनता पार्टी ने १९८४ में अपने सहोदर धार्मिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद् के जरिये राम मंदिर का मुद्दा उठाया और जब उसी साल कांसीराम ने दलितों के नाम पर बहुजन समाज पार्टी बनाई तो अगले चार वर्षों मे भारतीय समाज को तोड़ने के लिए तत्कालीन सत्ता पक्ष (विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व में) पिछड़ी जातियों के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लाया जिसमे आरक्षण के ज़रिये सरकारी नौकरियों में पिछड़ों को भी शामिल करने की अनुशंसा थी.

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अगले दो साल में तमाम राज्यों में सामाजिक न्याय की ताकतों के रूप में कोई लालू यादव और कोई मुलायम सिंह यादव उभरने लगे. कारण यह था कि उत्तर भारत के इन दो राज्यों—उत्तर प्रदेश और बिहार– में यादव का प्रतिशत क्रमशः १० और १६ और मुसलमानों का १८.६ और १०.२ प्रतिशत है और यादव अन्य पिछड़ी जातियों के मुकाबले आक्रामक भी अधिक था.
जब भी किसी मायावती, स्वर्गीय जयललिता, मुलायम सिंह यादव या लालू यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो अगले चुनाव में उनके वोट बढ़ गए और अधिकांश अवसरों पर ये सत्ता पर काबिज़ हो गए. दरअसल भारत में प्रजातंत्र की नियति हीं उल्टी है. वोटर के संकीर्ण पहचान समूहों में बंटे रहने के कारण अपने भ्रष्ट नेता में उसे “अपना असली रॉबिनहुड” नज़र आता है. ऐसा इसलिए होता है कि अर्ध-शिक्षित, अभाव-ग्रस्त और “कोऊ नृप होहीं हमें का हानि” के शाश्वत भाव से अर्ध-मूर्छा की स्थिति में जीने वाले भारतीय समाज के बड़े तबके की तर्क-शक्ति क्षीण होती है और वह इतने से संतुष्ट हो जाता है कि उनकी जाति का व्यक्ति भी सदियों से शोषक रहे उच्च वर्ग की भाषा बोलता है और वैसा हीं भ्रष्टाचार भी करता है. शहाबुद्दीन सरीखे अपराधियों को भी (आज भी भारतीय संसद में लगभग एक-तिहाई माननीयों पर आपराधिक मुकदमें हैं) इसलिए चुनता है कि राज्य, उसके अभिकरणों या कानून-व्यवस्था पर उसका विश्वास कम होता जा रहा है और अपराधियों में उस “न्याय” की उम्मीद दिखती है. मर्डर के दर्ज़नों मामले में जेल में बंद बिहार के खतरनाक अपराधी शहाबुद्दीन का लोक सभा में पांच बार चुना जाना इसी के संकेत हैं.

बिहार का राजनीतिक परिदृश्य देश के प्रजातंत्र के इसी बिगड़ते स्वास्थ्य का परिचायक है. राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जनता के सामने उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपनी बेगुनाही सिद्ध करें. संवैधानिक स्थिति यह है कि अनुच्छेद १६४(२) के “सामूहिक जिम्मेदारी” के सिद्धांत के तहत मुख्यमंत्री को अपने मंत्री से यह कहना था कि आप मुझे अपनी बेगुनाही के सबूत दें. जनता अदालत होती तो इस उप-मुख्यमंत्री के पिता लालू यादव २० साल तक देश की छाती पर मूंग दलते हुए हर चुनाव में जीत के बाद संविधान में निष्ठा और विश्वास की शपथ लेते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त न रहते.
बहरहाल बिहार की राजनीतिक परिणति जो भी हो दो परिणाम अवश्यम्भावी हैं. पहला : नीतीश अपनी राजनीतिक निष्ठा को लेकर पाला बदलने की क्षमता की धमक से सत्ता में बने रहेंगे और दूसरा: तेजस्वी का जाना तय है. खबर यह है कि लालू यादव “गरीबों व मजलूमों की आवाज को उठाये रखने के लिए” अपनी सात बेटियों में से मुंबई-स्थित तीसरी बेटी को मंत्री पद की शपथ दिलाएंगे याने संविधान में निष्ठा व् विश्वास की एक बार फिर शपथ. इस प्रक्रिया से लालू के हाथ में राज्य की सत्ता भी बनी रहेगी और नीतीश की इमेज भी.

राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले प्रजातंत्र के घाव से बहते उस मवाद का संकेत देते हैं जिसकी सडांध चीख-चीख कर समाज के कैंसर के “मेटास्टेसिस” स्टेज (जब यह बीमारी शरीर के तमाम हिस्सों में फ़ैलने लगती है) के खतरे की ओर इंगित करती है. अगर ऐसे राजनेता दसियों साल तक वोट भी हासिल करते रहते है तो ग़लती नेता की नहीं जनता की समझ की है।
अगर विपक्ष को मजबूत होना है तो कांग्रेस को सौर –मंडल के उस मुख्य सूर्य की तरह बनना पडेगा जिसके इर्द –गिर्द ग्रह की तरह तमाम क्षेत्रीय दल रहते हैं. उसे अपने कैडर को वैचारिक रूप से मजबूर करना होगा ताकि दिग्विजत सिंह ब्रांड छद्म धर्मनिरपेक्षता से हट कर वास्तविक मुद्दे पर जन चेतना जगाये जो कि भारतीय जनता पार्टी और इसके अनुसांगिक संगठनों की व्यापक सांप्रदायिक अपील की काट बन सके. यह तब तक नहीं हो सकता जबतक जाति समूहों में बंटे लोगों की चेतना में यह बात नहीं बैठेगी ये लालू-मुलायम-मायावाती उनके कल्याण से ज्यादा अपने और अपने परिवार के कल्याण में लगे हैं. और यह काम भी या तो कांग्रेस कर सकती है या भारतीय जनता पार्टी. अभी तक भारतीय जनता पार्टी हीं इसमें भी आगे दीख रही है. और यही वजह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में भी इस “सांप्रदायिक” पार्टी को यादवों और अन्य पिछड़ों के वोट मिलने लगे हैं जबकि “सेक्युलर” कांग्रेस को नहीं.

(वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह के ब्लॉग से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)

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